Sunday, June 24, 2018

पुनर्स्थापन

बुझ गयी अंदर की आग
अब न दीवाली है न फाग
डूबे हैं  बदरंगी दुनिया में
न राग ढंग से और न विराग

तूने कुंठाओं से था उबारा
हर पल दिया था पुनर्जन्म
हो कृतघ्न तुझको ही भूले
अब प्रायश्चित्त का है प्रसंग

कृत्रिम हो गया है जीवन
न प्रेम बचा न शेष धर्म
काव्यनीर जीवन उसका
पुनः सिंचित हो काव्यकर्म

औषधि थी यह काव्यकला
रोग जब हो गया दूर
त्याग औषधि वैद्य को तब
राग रंग में हुआ मशगूल

छेदोपस्थापन आज हुआ है
जीवित हो रहा अनेकान्त
मां सरस्वती की हो कृपा
अरमान पूरे हों दो वरदान

- कुमार अनेकान्त

पुराने दिन

आज छात्र जीवन के एक अनन्य मित्र से मुलाकात हुई तो पुराने दिन याद आ गए । कविता लिखना छूट गया कहा तो वो गुस्सा हो गया और जिद करके ये पंक्तियां लिखवा गया ........................

याद करें उन मधुर पलों को
जब दिल खोल के जीवन जीते थे

न थी कोई जिम्मेदारी
अपनी दुनिया में रहते थे
कोई दो पंक्ति भी मांगे तो
लंबा ख़त लिख देते थे

दिमाग से नहीं दिल से सोचा करते थे
प्यार हो या गुस्सा
कहने से नहीं डरते थे

जुनून था और जज़्बा भी
हमेशा कुछ नया करते थे
तोड़ते नहीं थे विश्वास उसका
दोस्ती जिससे करते थे

नादान थे और भावुक भी
खुद के ही नशे में रहते थे
शैतानियां चाहे जितनी करें
साजिशें कभी न करते थे 

जायज़ न लगे कोई बात
तो विरोध खुलकर करते थे
छात्र थे विचारक भी
झूठी दुनिया से न डरते थे

टेंशन देते हों भले बहुत
खुद कभी नहीं लेते थे
कोई सखा हो डिप्रेशन में
गले लगा उसे खुश करते थे

अब वैसा सावन नहीं है
न ही है वो मानवता
दुनिया ढल चुकी नफ़रत में
न ही है वो भावुकता

याद करें उन मधुर पलों को
जब दिल खोल के जीवन जीते थे
खुलकर हँसते खुल कर गाते
नहीं फ़िक्र किसी की करते थे

- कुमार अनेकान्त

Monday, March 26, 2018

तुम्हारे महावीर से अलग है मेरा महावीर

‘तुम्हारे महावीर से अलग है मेरा महावीर’

महावीर को सब याद करते हैं
तुम भी मैं भी
तुम उन्हें इसलिए महावीर मानते हो
क्योंकि बचपन में एक सर्प आने पर
दूसरे बालकों की तरह वे डरे नहीं थे
नगर में हाथी के उपद्रव पर
सब भाग गए थे
लेकिन उन्होंने उसे काबू में कर लिया था |
और भी किस्से – कहानियाँ
हैं उनकी वीरता के
जिस कारण तुम कहते
उन्हें महावीर
मगर मेरे महावीर वह है
जो धर्म के साथ विज्ञान समझाते थे
जीवन का लक्ष्य आत्मज्ञान बतलाते थे
जब पूरी दुनिया ईश्वर को
सृष्टि का कर्त्ता मानती थी
निज पुरुषार्थ भूलकर
भाग्य भरोसे बैठी थी
धर्म के नाम पर
चारों ओर हिंसा फैली थी
अनासक्ति, वैराग्य के नाम पर
बस पाखंडियों की टोली थी
उस समय उनका अभ्युदय
एक दिव्य प्रकाश बना था
मिथ्वात्व दूर भगा कर आत्मा को
कर्मों से मुक्त किया था
खुद का खुदा खुद में ही बसा
ऐसा यथार्थ बताया
भगवान भरोसे बैठी जनता में
आत्मपुरुषार्थ जगाया
वस्त्रों से भी मोह छोड़कर
सच्चे फकीर बने थे
बस तब से ही वो मेरे
सच्चे महावीर बने थे |
    - कुमार अनेकांत (AKJ)
drakjain2016@gmail.com

Tuesday, March 13, 2018

अभी जीने का शऊर आया ही नहीं

अभी जीने  का  शऊर  आया ही नहीं,
उन्होंने मरने की इजाज़त दे डाली ।

Thursday, February 15, 2018

वो मुझसे प्यार नहीं करती ? कुमार अनेकान्त

वो मुझसे प्यार नहीं करती ?

रोज सुबह पांच बजे उठती है
बच्चों का टिफिन बनाती है
और मेरे लिए चाय
अखबार छुपा देती है
ताकि मैं जल्दी नहाकर
मंदिर हो आऊं
जबरजस्ती मॉर्निंग वॉक पर
ले जाती है
मेरा मनपसंद खाना भी नहीं देती है
वो खाना देती है जिससे
वजन न बढ़े और मैं स्वस्थ्य रहूं
मुझे क्या पहनना है
किस रंग का पहनना है
अधिकार पूर्वक तय करती है
विश्वविद्यालय जाते समय
पर्स, मोबाइल,पेन,रुमाल
बैग हाथ में दे देती है
वहाँ पहुंचते ही फ़ोन करती है
अच्छे से पहुंच गए न
लंच के बाद पूछती है
दवा ले ली न
इस बीच कपड़े धो देती है
बाजार से सामान ले आती है
बच्चों को स्कूल से लाती है
शाम को फोन करती है
कब तक पहुंचोगे
शाम के खाने को देर मत करना
घर आते ही पूछती है दिन कैसा रहा ?
मेरी उलझने सुनती है
सुलझाने की कोशिश करती है
कुछ नया लिखने को प्रेरित करती है
कोई महंगी चीज ख़रीदकर दो
तो डांटती है क्या जरूरत थी इतने खर्चे की
दिन भर नाचती है सबकी सेवा में
फोन करती है मगर मां बापू को उनकी खैर पूछने
मुझे एक बार भी आई लव यू नहीं बोलती
मगर कौन कहता है
वो मुझसे प्यार नहीं करती ?

जो खुद गुलाब है
उसे क्या गुलाब दूं ?
जिसका हर दिन वेलेंटाइन है
उसपर जान कुर्बान दूं ।

-कुमार अनेकान्त

Saturday, February 18, 2017

एक वोट माँगा था,दिल के चुनाव में

एक वोट माँगा था,दिल के चुनाव में
जमानत जब्त करवा दी ,उसने ख्वाब में
निर्दलीय था तो क्या हुआ,दिल तो था
नामांकन भी नहीं किया मेरे प्रस्ताव में
©Kumar Anekant

Sunday, December 25, 2016

तुम अपना बस मतलब साधो काम बना लो

बिखरे सपनों का ढेर पड़ा है मजे उड़ा लो
और कुछ रातें जगी खड़ी हैं उन्हें सुला लो

टूटे अरमानों पर उनके महल खड़े हैं
तुम खुशियों की उनमें बरात सजा लो

मेरी मजबूरी पर लब उनके मुस्काते हैं
इस दिल से जब भी चाहो मन बहला लो

जीते हरदम लेकिन तेरे घर हारे हैं
तुम जीतों के रंगबिरंगे जश्न मना लो

कोई नहीं साथ तुम्हारे 'अनेकांत' यहाँ पर
उनकी महफ़िल भंग न हो इंतजाम करा लो

रोये चाहे कोई कहीं पर उससे तुमको क्या
तुम अपना बस मतलब साधो काम बना लो

                                                       - (c) कुमार अनेकांत