Sunday, December 28, 2025

हमें कुछ नहीं पता है

जब 
कुछ नहीं आता था 
तब 
लगता था 
हमें सब कुछ पता है 
जब
 कुछ आने लगा 
तब लगा 
कि
हमें कुछ नहीं 
पता है 

कुमार अनेकांत 
28/12/2019

Thursday, December 18, 2025

मेरी अज्ञान मीमांसा

मेरी अज्ञान मीमांसा 

- कुमार अनेकान्त 

जब मैं अपने भीतर उतरकर देखता हूँ,
तो एक मौन-सा प्रश्न मुझे घेर लेता है—
मैं इतना अशांत क्यों रहता हूँ, जबकि बाहर तो कुछ भी स्थायी नहीं है?

तभी मुझे अपनी निपट अज्ञानता भी दिखाई देती है।
मैं ही हूँ, जो हर क्षण इष्ट और अनिष्ट की रेखाएँ खींचता रहता हूँ।
मैं ही हूँ, जो कल्पनाओं के रंग भरकर संसार को अपने अनुकूल या प्रतिकूल बनाने की मिथ्या कल्पना करता हूँ।
और फिर उन्हीं रंगों से स्वयं को बाँध लेता हूँ।

मेरी अज्ञानता का मूल यह है कि मैं 'स्व' को भूल चुका हूँ।
इतना भूल चुका हूँ कि अब सदा पर में जीता हूँ—
दूसरों की प्रतिक्रियाओं में, परिस्थितियों के उतार–चढ़ाव में,
वस्तुओं के मिलने–न मिलने में।

जो मुझे सहूलियत देता है,
मैं उसे इष्ट कहकर सीने से लगा लेता हूँ।
जो मेरी राह में बाधा बनता है,
मैं उसे अनिष्ट कहकर भीतर ही भीतर ठुकरा देता हूँ।

पर क्या सचमुच वे वस्तुएँ या इंसान ऐसे हैं?
या यह केवल मेरी दृष्टि का भ्रम है?

धीरे-धीरे यह रहस्य मुझ पर खुलने लगता है—
इष्ट–अनिष्ट किसी वस्तु में नहीं है, वह केवल मुझमें है।
वस्तुएँ तो बस जैसी हैं, वैसी ही हैं—
न प्रिय, न अप्रिय।
प्रियता और अप्रियता तो मैंने ओढ़ ली है।

एक ही वस्तु,
एक ही क्षण में मुझे भाती है
और अगले ही क्षण मुझे बोझ लगने लगती है।
भूख में जो भोजन मुझे अमृत लगता है,
तृप्ति के बाद वही भोजन आँखों से ओझल हो जाना चाहता है।
तब मैं समझ पाता हूँ—
स्वाद वस्तु में नहीं, मेरी मनःस्थिति में था।

तो फिर मैं किससे लड़ रहा हूँ?
किससे प्रेम कर रहा हूँ?
दरअसल, मैं तो अपनी ही कल्पनाओं से उलझा हुआ हूँ।

मेरे सुख और मेरे दुःख—
मेरी शांति और मेरी कषाय—
इन सबका कारण न तो कोई व्यक्ति है,
न कोई परिस्थिति।
कारण केवल वह विकल्प है,
जो मैं क्षण-क्षण उठाता हूँ।

मैं चाहूँ तो उसी क्षण स्वयं को सुखी मान सकता हूँ।
और चाहूँ तो उसी क्षण दुखी।
यह अधिकार किसी और के पास नहीं—
यह मेरे ही हाथ में है।

पर तभी भीतर से एक और गहरी आवाज़ उठती है—
क्या यही वास्तविक आनंद है?
नहीं…
वास्तविक आनंद तो तब है
जब मैं कोई विकल्प ही न उठाऊँ।
जब मैं रुक जाऊँ।
जब मैं मौन हो जाऊँ।

मेरे मन में तो हर समय कुछ न कुछ चलता रहता है—
शब्द, चित्र, स्मृतियाँ, आशंकाएँ।
और मैं अब तक इन्हीं को मैं समझता रहा।
पर आज पहली बार
मैं उस साक्षी को महसूस करता हूँ—
जो इन सबको देख रहा है।
जो शांत है।
जो अछूता है।

मैं समझता हूँ कि
मैं मन नहीं हूँ।
मैं वह हूँ, जो मन को जानता है।

मैं भूतकाल में भटकता हूँ—
जो जा चुका है, जो अब जीवित ही नहीं।
मैं भविष्य में उलझता हूँ—
जो अभी आया ही नहीं।
और वर्तमान…
इस चक्कर में
वर्तमान तो मैं जी ही नहीं रहा।

इन विचारों से मुझे केवल अशांति मिलती है।
और साथ ही अनजाने में
मैं नए-नए कर्मों की बेड़ियाँ गढ़ता चला जाता हूँ।

अब मुझे यह भी दिखने लगा है कि
कोई भी विकल्प हल्का नहीं होता।
हर विकल्प की कीमत होती है।
और वह कीमत मुझे ही चुकानी पड़ती है।

तो फिर क्यों न मैं रुक जाऊँ?
क्यों न मैं इस क्षण में ठहर जाऊँ?

जो बीत गया, उसे जाने दूँ।
जो आने वाला है, उसे आने दूँ।
और जो अभी है—
उसे बस देखूँ।

बिना जोड़े।
बिना तोड़े।
बिना नाम दिए।

बस देखता रहूँ…
बस जानता रहूँ…
सहज रहूँ
ज्ञाता–द्रष्टा बनकर।

और इसी मौन में,
इसी निर्विकल्प स्थिति में,
मुझे पहली बार
अपने होने की हल्की-सी सुगंध मिलने लगती है।

लगने लगता है कि
स्व को जाने बिना
पर को जानना ज्ञान नहीं अज्ञान है 
क्यों कि
स्व को जानना ही ज्ञान है ।

19/12/25

Monday, December 15, 2025

AI और ज्ञायक भाव

AI और ज्ञायक भाव 

- डॉ अनेकान्त कुमार जैन 

पहले समझता था श्रुत ही ज्ञान है 
फिर पुस्तकों ने बताया यह तो जड़ भी कर सकता है
फिर लगा गणित ही ज्ञान है 
फिर केलकुलेटर ने बताया यह तो जड़ भी कर सकता है 
फिर लगा बहुत तरह की याददाश्त ज्ञान है 
फिर रिकॉर्डर ने बताया यह तो जड़ भी कर सकता है 
फिर लगा बहुत सारी सूचनाएं ज्ञान है
फिर नेट ने बताया यह तो जड़ भी कर सकता है 
फिर लगा रिसर्च खोज ही ज्ञान है 
फिर गूगल ने बताया यह तो जड़ भी कर सकता है 
फिर लगा कि रचनात्मकता ज्ञान है 
फिर AI ने बताया यह तो जड़ भी कर सकता है 
तकनीक का विकास आत्मा के वास्तविक
ज्ञान गुण की समझ विकसित कर सकता है 
समयसार आत्मा के ज्ञायक भाव से मिला सकता है 
16/12/25

Monday, December 1, 2025

प्राकृत रचनाएं

[28/01/2024, 10:11 am] Prof Anekant Jain: वड्ढदु णूयणतित्थं
सया मम कामणा पुरातित्थं वि ।
बालगस्स लालणे वि
मूलरक्खणं मा विस्सरिदव्वं ।।

मेरी कामना है कि सदा नए तीर्थों का निर्माण हो किन्तु प्राचीन तीर्थ भी संरक्षित हों ,उनका विकास हो । नवजात बालक के लालन पालन में मूल माता पिता और दादा दादी का रक्षण नहीं भूलना चाहिए ।

[30/01/2024, 9:36 am] Prof Anekant Jain: सव्वदुक्खं विणस्सदि
जया हविस्सदि मणपसण्णो भमो ।
मणं पसण्णो रक्खदु
तया सव्वदुक्खं विणस्सदि ।।

सब दुःख दूर होने के  बाद मन प्रसन्न होगा ये आपका भ्रम है I 
मन प्रसन्न रखो सब दुःख दूर हो जायेंगे ये हकीकत है I

[31/01/2024, 9:02 am] Prof Anekant Jain: वयो सुजीवणं किदं
सगजणपसण्णत्थं ण खलु होही ।
जो सुपसण्णं होही
सो य ण आसी सगपरिजणो ।।

भावार्थ - 
मैंने अपना सुंदर जीवन अपनों को खुश करने में व्यर्थ ही व्यय कर दिया ,किन्तु वे फिर भी खुश नहीं हुए और जो खुश हुए वे अपने नहीं थे ।

©कुमार अनेकांत
31/1/24

[01/02/2024, 8:51 pm] Prof Anekant Jain: अण्णाणस्स य णासो
अज्झययेण होदि ण मुक्खत्तस्स ।
परदेसस्स य गीयं
गायन्ति आयरियभरहस्स ।।

अध्ययन से अज्ञानता का नाश होता है किंतु मूर्खता का नहीं (शायद इसीलिए) (भारतीय शिक्षा प्राप्त) भारत के आचार्य (विद्वान्)
(हर विषय पर) परदेश के गीत गाते रहते हैं ।

©कुमार अनेकांत 
1/2/24

[02/02/2024, 11:16 am] Prof Anekant Jain: विद्वान् और मूर्ख 

विउसो मुक्खमज्झे य
विउसो धारइ सया हु समभावं ।
जइ मुक्खो धारइ सो
कहं मुक्खत्तसिद्धो होइ ।

विद्वान् और मूर्ख (की लड़ाई) के बीच में विद्वान् ही समता रखते हैं । यदि मूर्ख ही समता रख ले तो भला उसका मूर्खतत्व सिद्ध कैसे होगा ? 


कुमार अनेकांत 
2/2/24

[02/02/2024, 4:50 pm] Prof Anekant Jain: निंदा....

करदु करदु मम णिंदा , गइदूण पइगेहे य जहासक्कं ।
पसिद्धो होदि तुम्हे
वि निंदगसम्माटरूवेण ।। 


करो करो खूब करो,बल्कि घर घर जाकर मेरी निंदा जितनी कर सको उतनी करो ,(क्यों कि) इससे तुम भी निंदक सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हो जाओगे ।

©कुमार अनेकांत 
2/2/24

[04/02/2024, 11:11 am] Prof Anekant Jain: परिवट्टणं हु णियदं,
खणे-खणे सहावं  संसारस्स  ।
करदु पतिक्खधीरेण
वट्टणिस्सदि
दिणं वि दिलं वि  ।।

क्षणभंगुर इस संसार में हर चीज का बदलना तय है,                 बस प्रतीक्षा कीजिए,                                                                               किसी के दिल भी बदलेंगे,                                                              तो किसी के दिन भी बदलेंगे

©कुमार अनेकांत 
4/2/24


[05/02/2024, 5:26 pm] Prof Anekant Jain: उसहसुपुत्तो भरदो 
चक्कवत्तीसासगो छक्खंडे
देसोभारदवस्सो
णामो वि जादो भरदत्तो 

तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत जो छह खंड के चक्रवर्ती सुशासक राजा थे , अपने देश का नाम भारतवर्ष उन्हीं भरत सम्राट के कारण पड़ा । 

इइ सुकहापुराणेसु ,
गायन्ति खलु वेदजइणागमेसु ।
खरवेलसिलालेहे ,
'भरधवस' खलु दसमपंतिम्मि ।। 

यह सुकथा वैदिक एवं जैन पुराणों एवं आगमों में खुलकर गाई गयी है तथा खारवेल के शिलालेख में भी भारत वर्ष यही नाम मिलता है । 

19/12/23
[05/02/2024, 6:48 pm] Prof Anekant Jain:

 ण भविस्सइ समागमो,
सया भविस्सइ ण अहं भविस्सामि।
जदि दुवे य भविस्सन्ति,
ण भावं सिग्घधम्मं करिदव्वं ।।


यह सत्समागम हमेशा नहीं रहेगा ,यदि रहा तो हम न रहेंगे ,यदि ये दोनों  रहे तो जरूरी नहीं कि वैसे शुद्ध भाव रहें ,जैसे आज हैं । अतः यथा शीघ्र धर्म (आत्मानुभव)कर लेना चाहिए ।


[06/02/2024, 9:15 am] Prof Anekant Jain: अंधयारे य छाया ,
जरे काया मरणमाया कयावि ।
ण खलु ददइ सहजोगं,
पयत्णं करदु जहासक्कं  ।।

अंधकार में छाया ,बुढ़ापे में  काया और मृत्यु के समय माया,निश्चित ही कभी भी सहयोग नहीं देती है ,यथा शक्ति कितना भी प्रयत्न कर लो ।

©कुमार अनेकांत 
6/2/24


[09/02/2024, 1:57 am] Prof Anekant Jain: ज्येष्ठ प्रेम 

जेट्ठोमि सया अहं 
तुम्हत्तो तुम्हे य वसइ हियये।
जइ च इच्छदि सम होदु
सगहियये खलु वसदु ममावि ।।

मैं तुमसे सदा ज्येष्ठ ( सिद्ध होता) हूँ ,क्यों कि तुम मेरे हृदय में रहते हो ।और यदि (तुम भी) मेरे समान(  ज्येष्ठ) होना चाहते हो तो मुझे भी अपने हृदय में जरूर बसा लो ।

©कुमार अनेकांत
10/2/24

[10/02/2024, 6:12 am] Prof Anekant Jain: ठंडक


असुहचिंतगविपदे वि
कीरइ य सहाणुभूइपदंसणं ।
कट्ठेहं दंसणेण ,
हिययो तस्स होइ सीयलं ।।

मेरा अहित चिंतन करने वाला भी विपदा के समय मेरे पास आकर सहानुभूति प्रदर्शित करता है ,(ऐसा क्यों न हो ) मैं कष्ट में हूँ ,ऐसा देखकर उसके हृदय को ठंडक जो पड़ती है ।

©कुमार अनेकांत 
10/2/24

[10/02/2024, 3:28 pm] Prof Anekant Jain: मंजिल 


धावइ य अइवेगेण,
आडम्बरझूठमायापलोहणं ।
किंतु जो लक्खं लहइ,सो मत्तसच्चमेव य अत्थि ।।

भावार्थ - 
*(यद्यपि )झूठ ,माया ,प्रलोभन और दिखावे की रफ्तार बहुत तेज होती है.....*

*मगर मंजिल तक केवल सच ही पहुँचता है।*

कुमार अनेकांत
12/02/24

[12/02/2024, 9:13 am] Prof Anekant Jain: पस्सइ कालगहवत्थु
परदोसं मणुसो विवत्तिकाले ।
ण  पस्सइ कम्मदोसा,
अम्मं कहं बबइबबूलेण ।।

बुरे दिन आने पर मनुष्य कालसर्प दोष,ग्रह दोष,वास्तु दोष , परिजनों के दोष आदि बाहर में ही दोष तो देखता है किन्तु स्वयं अपने कर्मों के दोष नहीं देखता । यह भी विचारना चाहिए कि बबूल के बोने पर आम भला कैसे हो सकता है ? 

कुमार अनेकांत 
12/2/24
[12/02/2024, 2:30 pm] Prof Anekant Jain:

 दस्सदि खलु णियदोसं ,
सज्झायेण णाभावदोसाणं ।
अभावो य होदि तस्स ,
तवचरित्ताप्पाणुभवेण ।।

स्वाध्याय से निजदोषों का दर्शन तो होता है किंतु उन दोषों का अभाव नहीं होता ,उन दोषों का अभाव तप चारित्र और आत्मानुभव से ही होता है । 

©कुमार अनेकांत
12/2/24

[12/02/2024, 6:50 pm] Prof Anekant Jain: "*दान" वही करना चाहिए, जहाँ उसकी कद्र और उपयोगिता हो*

*क्योंकि दिन में "दिया" जलाने से अंधकार नहीं अपितु दिये का वजूद कम होता है*

कीरदि य तत्थ दाणं,
आवस्सगदा अत्थि य सम्माणं ।
सुज्जपगासकालम्मि
दीवपगासेण को लाभो ।।

दान वहाँ करना चाहिए जहाँ उसकी आवश्यकता हो और सम्मान हो । सूर्य के प्रकाश में दीप जलाने से क्या लाभ है ? (अपितु उसकी कीमत ही कम होती है )

कुमार अनेकांत 
12/2/24
पंजाब मेल (झांसी से दिल्ली)