Thursday, September 3, 2026

अपमान - प्राकृत गाथा

अपमान

परं ण अवमण्णेमि मे,
ण खलु अहंयारी एत्तिओ अम्हि।
अण्णस्स वि ण सहामि,
ण साहू गिहत्थिओ अम्हि॥

भावार्थ :
मैं दूसरों का अपमान करूँ, इतना अहंकारी भी नहीं हूँ;
किंतु दूसरे का अहंकार सहूँ, ऐसा भी नहीं है
क्योंकि मैं गृहस्थ हूँ, साधु नहीं।

अनेकांत
३/०९/२६

Tuesday, September 1, 2026

बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है

बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है 


*बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है*

नजरें कमजोर हुईं
तो चश्मा लगा लिया।
बाल सफेद हुए
तो उन्हें रंग लिया।
चेहरे पर झुर्रियाँ आईं
तो उन्हें श्रृंगार के पीछे छिपा लिया

कान कम सुनने लगे
तो श्रवण यंत्र लगा लिया।
दाँत झर गए
तो नकली दाँत लगा लिए

शक्ति क्षीण हुई
तो क्रोध के आवरण में
अपने अहंकार को और कठोर कर लिया
और
हम कहते हैं
हमने स्वयं को सँभाल लिया

पर कितना अद्भुत विरोधाभास है
हम शरीर को सँभालते सँभालते
उस संदेश को ही खो देते हैं
जो शरीर हमें प्रतिदिन दे रहा है

प्रकृति हमें समझा रही है
कि सब कुछ अनित्य है
देह बदल रही है
यौवन जा रहा है
इंद्रियाँ क्षीण हो रही हैं
समय हाथ से निकल रहा है

पर हम
हर संकेत पर पर्दा डालकर
स्वयं को समझाते रहते हैं
कि अभी कुछ नहीं बदला
हम दूसरों से नहीं
अपने ही मोह से धोखा खा रहे हैं

बुढ़ापा हमें डराने नहीं आया
वह जगाने आया है
हर झुर्री
अनित्य का उपदेश है

हर सफेद बाल
वैराग्य का निमंत्रण है
हर क्षीण होती इंद्रिय
देह से भेदज्ञान की पुकार है

हर घटती शक्ति
कहती है
अब बाहर नहीं
भीतर लौटो।

लेकिन हम
प्रकृति के इस शाश्वत प्रवचन को
श्रृंगार, सुविधा और अहंकार से ढँक देते हैं
कितना बड़ा अवसर खो देते हैं
देह को बचाते बचाते
आत्मानुभूति से बचने का

जबकि आवश्यकता यह नहीं कि
ढलती देह को रोकें,
आवश्यकता यह है कि
उसके प्रत्येक परिवर्तन में
अपने अपरिवर्तनशील शुद्धात्म तत्त्व
को पहचानें।

बुढ़ापा देह का सत्य है
और उसी सत्य को देखकर
निज चैतन्य का बोध होना
जीवन का सौभाग्य है।

 अनेकांत 
१/०९/२६

Saturday, August 29, 2026

सम्यग्दर्शन

सम्यग्दर्शन

खुद
ही
ठीक
हो
जाएंगीं
सारी
बातें
यदि
बंद
होने
से
पहले
खुल
जाएं
आँखें ।

अनेकांत
३०/८/२६

Thursday, August 27, 2026

तुम रूठे - प्राकृत गाथा

तुम रूठे 

*तुम्हं रुट्ठे अम्हे, दुक्खसएहिं विमुक्का हि अम्हे।*
*तुज्झ कोहो सुहकरो, अम्हाणं सो वरं लद्धं।।*

भावार्थ:

तुम रूठे तो हम सैकड़ों दुःखों से मुक्त हो गए;
तुम्हारा क्रोध भी हमारे लिए सुखकर निकला,हमें तो वही वरदान मिल गया।

अनेकांत
२८/०८/२६

दिल टूटने से थोड़ी तकलीफ तो हुई ,लेकिन तमाम उम्र का आराम हो गया ।

Tuesday, August 25, 2026

कोई पूछता नहीं - प्राकृत गाथा

कोई पूछता नहीं 


थेरा सव्वं जाणंति, सव्वकज्जेसु उवाया बहुविहा हि।
तेसिं को वि ण पुच्छइ हि, एसा लोअस्स विडंबणा।।
 
बुज़ुर्गों को सब पता है,उनके पास हर समस्या का  समाधान भी है, पर इस जगत में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उनसे समाधान पूछने वाला कोई नहीं है ।

अनेकांत
२५/०८/२६

Sunday, August 23, 2026

दूरी - प्राकृत गाथा

दूरी 

दूरट्ठिओ ण दूरो, जो जस्स मणम्मि णिच्चं संठिओ।
जो जस्स हिअए णत्थि, समीवट्ठिओ वि अइ दूरओ।।

जो जिसके मन में सदा बसा है, वह दूर रहकर भी पास है।
और जो जिसके हृदय में नहीं बसा, वह समीप रहकर भी अत्यन्त दूर है।


अनेकांत 
२३/०८/२६

Friday, August 21, 2026

दोष - प्राकृत गाथा

दोसे णिवारइ जणो,
सो हि हितकामी तस्स मा कुप्पह।
विणासिणो ण बोहंति,
विणासं च कुणंति हि सव्वदा॥

भावार्थ:
जो तुम्हारे दोषों को बताया करता है ,तुम्हें रोकता टोकता है, वही वास्तव में तुम्हारा हितैषी है,उससे कभी नाराज मत होना । जो तुम्हारा विनाश चाहते हैं, वे तुम्हें सावधान नहीं करेंगे, कभी तुम्हें रोकेंगे टोकेंगे नहीं ,बल्कि विनाश ही करेंगे । 

प्रो अनेकांत कुमार जैन 
२२/०८/२६