Wednesday, March 4, 2026

आत्महत्या

आत्महत्या 

ऊंची छत से कूद जाना 
पंखे से लटक जाना 
जहर खा लेना 
नस काट लेना 
ट्रेन से कट जाना 
ये वो आत्म हत्या है 
जो बस एक बार होती है 
और सब खत्म 
पर 
जानबूझ कर खुद को तन्हा कर लेना 
अपनों से ही बगावत कर लेना 
खुद का करियर खत्म कर लेना 
सदा आक्रोश में जीना 
खुद को भूलकर
किसी के प्यार में पागल हो जाना 
पूरी तरह इंद्रियों के वशीभूत हो जाना 
जरा सी बात पर अपमानित महसूस करना 
अपने आत्म संयम और आत्म बल को 
खो देना 
कुछ न सोचना न समझना 
न कुछ जानना और न जानने की इच्छा होना
विवेक शून्य हो जाना
वाणी पर संतुलन न रख पाना 
बात बात पर उत्तेजित होना 

ये भी तो आत्म हत्याएं हैं 
जिन्हें हम रोज करते हैं 
खुद को भूल कर 
तिल तिल रोज मरते हैं 

कुमार अनेकान्त 
 5/3/26

Sunday, February 1, 2026

आज पिता ने किए पूरे पचहत्तर वर्ष

कैसे भूलें कैसे कहें शब्द नहीं उत्कर्ष
आज पिता ने किए पूरे पचहत्तर वर्ष
सादगी समर्पण और गहरा संघर्ष 
खुद को भूले किया सभी का उत्कर्ष 
                     
सहे सभी उपद्रव शिकन न चेहरे पर आई 
परिवार निश्चिंत रहा कि हैं तो बड़े भाई 
किया बच्चों का पालन खुद का न ध्यान किया 
दिया सबको बहुत कुछ किसी से कुछ न लिया 

हो गए पूरे कर्तव्य अब करेंगे आत्मकल्याण 
परचिन्ता से दूर भजेंगे शाश्वत आतमराम 
जन्मदिन मंगलमय है सबकी यही कामना 
खुद को पा लें आप शीघ्र शुद्ध होवें भावना 

प्रो.अनेकान्त ,डॉ रुचि ,सुनय और अनुप्रेक्षा 

Tuesday, January 20, 2026

शुद्धात्मैकादशस्तोत्रम्

॥ शुद्धात्मैकादशस्तोत्रम् ॥
भूतभव्यवर्तमानानामर्हतां त्रिषु कालेषु ।
सर्वान् तान् जिनवरान् अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ १ ॥

भूतभव्यवर्तमानानां सिद्धानां परमेष्ठिनाम् ।
लोकाग्रस्थितसिद्धांश्च अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ २ ॥

भूतभव्यवर्तमानानामाचार्याणां महात्मनाम् ।
चारित्रधर्मसंयुक्तान् अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ३ ॥

भूतभव्यवर्तमानानामुपाध्यायान् महामुनीन् ।
श्रुतज्ञानप्रदीप्तांश्च अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ४ ॥

भूतभव्यवर्तमानानां साधूनां जिनशासनाम् ।
महाव्रतधरान् शुद्धान् अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ५ ॥

भूतभव्यवर्तमानानामणुव्रतधरान् जनान् ।
श्रावकान् जिनमार्गस्थां अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ६ ॥

भूतभव्यवर्तमानानां सम्यग्दृष्टीन् जिनाश्रयान् ।
तत्त्वश्रद्धासमायुक्तान् अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ७ ॥

भूतभव्यवर्तमानानां जिनमन्दिरभास्वताम् ।
देवायतनपुण्यानि अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ८ ॥

भूतभव्यवर्तमानानां जिनागमश्रुतात्मनाम् ।
धर्मज्ञानप्रदीपांश्च अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ९ ॥

कृत्रिमाकृत्रिमबिम्बानि जिनबिम्बानि भूतले ।
स्वर्गेऽपि यानि बिम्बानि तानि वन्दे निरन्तरम् ॥ १० ॥

त्रैकालिकस्वशुद्धात्मस्वरूपिणं निरामयम् ।
ज्ञानदर्शनसंयुक्तं अहं वन्दे निरन्तरम् ॥ ११ ॥

अनेकान्तकुमारजैन: 19/1/2026

Friday, January 2, 2026

हमारा हमसे ही अन्याय

हमारा हमसे ही अन्याय 

हम 
अक्सर 
अप्रमाणिक व्यक्ति की 
उस बात को 
जल्दी 
प्रमाण मान लेते हैं 
जो वह 
हमें 
हमारे ही मित्र के
खिलाफ भड़काने 
के लिए 
कहता है ।

कुमार अनेकांत 
३/१/२०२०

Thursday, January 1, 2026

नूतनवर्षाभिनंदनम् 2026

नूतनवर्षाभिनंदनम् 2026


नए वर्ष का मंगल प्रभात 
फिर आपका स्नेह साथ 
हो अपना यह मधुमय वर्ष 
बरसे ज्ञान न रहे संघर्ष 

मिथ्यात्व का हो पूर्ण विनाश 
जीवन हो सम्यक्त्व प्रकाश
‘अनुप्रेक्षा’ सी भावना रहे 
‘सुनय’ से हो एकांत नाश 

‘अनेकान्त’ से अभ्युदय हो 
अध्यात्म ‘रुचि’ विकसित हो 
प्राप्त करें जीवन का सार 
आपके हों सपने साकार 

नए वर्ष पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ 

प्रो अनेकान्त कुमार जैन 
डॉ रुचि जैन 
सुनय जैन ,अनुप्रेक्षा जैन
नई दिल्ली

Sunday, December 28, 2025

हमें कुछ नहीं पता है

जब 
कुछ नहीं आता था 
तब 
लगता था 
हमें सब कुछ पता है 
जब
 कुछ आने लगा 
तब लगा 
कि
हमें कुछ नहीं 
पता है 

कुमार अनेकांत 
28/12/2019

Thursday, December 18, 2025

मेरी अज्ञान मीमांसा

मेरी अज्ञान मीमांसा 

- कुमार अनेकान्त 

जब मैं अपने भीतर उतरकर देखता हूँ,
तो एक मौन-सा प्रश्न मुझे घेर लेता है—
मैं इतना अशांत क्यों रहता हूँ, जबकि बाहर तो कुछ भी स्थायी नहीं है?

तभी मुझे अपनी निपट अज्ञानता भी दिखाई देती है।
मैं ही हूँ, जो हर क्षण इष्ट और अनिष्ट की रेखाएँ खींचता रहता हूँ।
मैं ही हूँ, जो कल्पनाओं के रंग भरकर संसार को अपने अनुकूल या प्रतिकूल बनाने की मिथ्या कल्पना करता हूँ।
और फिर उन्हीं रंगों से स्वयं को बाँध लेता हूँ।

मेरी अज्ञानता का मूल यह है कि मैं 'स्व' को भूल चुका हूँ।
इतना भूल चुका हूँ कि अब सदा पर में जीता हूँ—
दूसरों की प्रतिक्रियाओं में, परिस्थितियों के उतार–चढ़ाव में,
वस्तुओं के मिलने–न मिलने में।

जो मुझे सहूलियत देता है,
मैं उसे इष्ट कहकर सीने से लगा लेता हूँ।
जो मेरी राह में बाधा बनता है,
मैं उसे अनिष्ट कहकर भीतर ही भीतर ठुकरा देता हूँ।

पर क्या सचमुच वे वस्तुएँ या इंसान ऐसे हैं?
या यह केवल मेरी दृष्टि का भ्रम है?

धीरे-धीरे यह रहस्य मुझ पर खुलने लगता है—
इष्ट–अनिष्ट किसी वस्तु में नहीं है, वह केवल मुझमें है।
वस्तुएँ तो बस जैसी हैं, वैसी ही हैं—
न प्रिय, न अप्रिय।
प्रियता और अप्रियता तो मैंने ओढ़ ली है।

एक ही वस्तु,
एक ही क्षण में मुझे भाती है
और अगले ही क्षण मुझे बोझ लगने लगती है।
भूख में जो भोजन मुझे अमृत लगता है,
तृप्ति के बाद वही भोजन आँखों से ओझल हो जाना चाहता है।
तब मैं समझ पाता हूँ—
स्वाद वस्तु में नहीं, मेरी मनःस्थिति में था।

तो फिर मैं किससे लड़ रहा हूँ?
किससे प्रेम कर रहा हूँ?
दरअसल, मैं तो अपनी ही कल्पनाओं से उलझा हुआ हूँ।

मेरे सुख और मेरे दुःख—
मेरी शांति और मेरी कषाय—
इन सबका कारण न तो कोई व्यक्ति है,
न कोई परिस्थिति।
कारण केवल वह विकल्प है,
जो मैं क्षण-क्षण उठाता हूँ।

मैं चाहूँ तो उसी क्षण स्वयं को सुखी मान सकता हूँ।
और चाहूँ तो उसी क्षण दुखी।
यह अधिकार किसी और के पास नहीं—
यह मेरे ही हाथ में है।

पर तभी भीतर से एक और गहरी आवाज़ उठती है—
क्या यही वास्तविक आनंद है?
नहीं…
वास्तविक आनंद तो तब है
जब मैं कोई विकल्प ही न उठाऊँ।
जब मैं रुक जाऊँ।
जब मैं मौन हो जाऊँ।

मेरे मन में तो हर समय कुछ न कुछ चलता रहता है—
शब्द, चित्र, स्मृतियाँ, आशंकाएँ।
और मैं अब तक इन्हीं को मैं समझता रहा।
पर आज पहली बार
मैं उस साक्षी को महसूस करता हूँ—
जो इन सबको देख रहा है।
जो शांत है।
जो अछूता है।

मैं समझता हूँ कि
मैं मन नहीं हूँ।
मैं वह हूँ, जो मन को जानता है।

मैं भूतकाल में भटकता हूँ—
जो जा चुका है, जो अब जीवित ही नहीं।
मैं भविष्य में उलझता हूँ—
जो अभी आया ही नहीं।
और वर्तमान…
इस चक्कर में
वर्तमान तो मैं जी ही नहीं रहा।

इन विचारों से मुझे केवल अशांति मिलती है।
और साथ ही अनजाने में
मैं नए-नए कर्मों की बेड़ियाँ गढ़ता चला जाता हूँ।

अब मुझे यह भी दिखने लगा है कि
कोई भी विकल्प हल्का नहीं होता।
हर विकल्प की कीमत होती है।
और वह कीमत मुझे ही चुकानी पड़ती है।

तो फिर क्यों न मैं रुक जाऊँ?
क्यों न मैं इस क्षण में ठहर जाऊँ?

जो बीत गया, उसे जाने दूँ।
जो आने वाला है, उसे आने दूँ।
और जो अभी है—
उसे बस देखूँ।

बिना जोड़े।
बिना तोड़े।
बिना नाम दिए।

बस देखता रहूँ…
बस जानता रहूँ…
सहज रहूँ
ज्ञाता–द्रष्टा बनकर।

और इसी मौन में,
इसी निर्विकल्प स्थिति में,
मुझे पहली बार
अपने होने की हल्की-सी सुगंध मिलने लगती है।

लगने लगता है कि
स्व को जाने बिना
पर को जानना ज्ञान नहीं अज्ञान है 
क्यों कि
स्व को जानना ही ज्ञान है ।

19/12/25