Wednesday, September 16, 2026

तन और मन - प्राकृत गाथा

तन और मन 

पुण्णम्मि ण रमे मणं, कायं तह वि णेहि पुण्णस्स कम्मे ।
पावम्मि ण रमे मणं, काओ वि मणं अणुकड्ढइ खलु ॥

भावार्थ :

पुण्य में मन न भी रमे, तो भी तन को पुण्य-कर्म में ले जाओ ; पाप में मन रमे, तब भी तन को वहाँ मत ले जाओ क्योंकि तन भी निश्चय ही मन को अपनी ओर खींच लेता है।

अभिप्राय :

मन की चिंता मत करो ,पहले अपने तन को सम्भालो । पाप में मन जाए तो जाए , मगर तन को जाने से बचाना चाहिए ।  इसी प्रकार पुण्य कार्य में मन न लगे तब भी तन को ले जाना चाहिए । क्यों कि तन जहाँ रहता है मन वहाँ वापस आता ही आता है । 


प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली 
१७/०९/२६

Tuesday, September 15, 2026

शुभ चिंतकों की प्रतिभा : प्राकृत गाथा

शुभ चिंतकों की प्रतिभा 

अम्हेहि ण भासंति वि, अम्हाणं सव्वजणेहि भासंति ।
 ण पेच्छिउं इच्छंति वि, दिट्ठी अम्हेसु णिवेसिया ॥

भावार्थ 
(हमें न चाहने वाले) हमसे बात तक नहीं करते, पर हमारे बारे में सभी से बात करते हैं। वे हमें देखना भी नहीं चाहते, फिर भी उनकी दृष्टि सदा हम पर ही लगी रहती है (यही उनकी सबसे बड़ी प्रतिभा है ) ।

प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली
१५/०९/२६

Thursday, September 10, 2026

थोवं सारं भणियंथोड़ा बोलो पर सारपूर्ण प्राकृत गाथा

थोवं सारं भणियं
थोड़ा बोलो पर सारपूर्ण 



भासणं ण जाणामि त्ति, वयणं आरंभयंति बहुवयणा ।
भणमाणा बहु वदंति, अंते तं खलु सच्चयंति ।। १ ।।

भावार्थ :

मुझे भाषण देना नहीं आता - ऐसा कहकर बहुत-से लोग अपना वक्तव्य आरम्भ करते हैं; फिर वे बहुत बोलते हैं , और अंत में सचमुच अपने ही उसी कथन को सत्य सिद्ध कर देते हैं।


अभिप्राय :

बहुत से लोग अपना भाषण इस वाक्य से प्रारंभ करते हैं कि उन्हें बोलना नहीं आता है ,और अंत में अपने ही इस वचन को सत्य सिद्ध कर के ही  दम लेते हैं ।


गंभीरभावहीणं, वयणदीहं पवड्ढंति बहुवयणा ।
थोवं सारं भणियं, सारवयणं खलु धीराणं ।। २।।

भावार्थ

गंभीर भाव से रहित वचन को बहुत वक्ता लंबा करते जाते हैं। थोड़ा ही बोलना चाहिए, पर सारयुक्त; निश्चय ही सारपूर्ण वचन धीर पुरुषों का होता है।

अभिप्राय 

वक्ता अपने वक्तव्य की गहराई की कमी को लंबाई में पूरा करते हैं । सच है थोड़ा बोलना चाहिए लेकिन सार्थक बोलना चाहिए।


प्रो.अनेकांत कुमार जैन,
नई दिल्ली 
११/०९/२६

Tuesday, September 8, 2026

बिना संगीत का भजन: प्राकृत गाथा

*बिना संगीत का भजन*


*तूरविहीणे वि मणे, जइ ण रमइ मणं अवि भत्तिजुत्तेण ।*
*अंतस्सरो ण जाओ, पढमं भत्तिकक्खं अज्ज वि ॥*

भावार्थ :
वाद्य-यंत्रों से रहित होने पर यदि मन (प्रभु की) भक्तियुक्त होकर नहीं रमता है , तो समझना  कि अभी अन्तः स्वर (अंदर का संगीत) जागृत नहीं हुआ है; (हम) आज भी भक्ति की पहली कक्षा में ही हैं।

अभिप्राय : 

यदि अभी भी बिना वाद्य यंत्रों के हमारा मन भक्ति में नहीं लगता है तो उसका मतलब है कि अभी अंदर का संगीत शुरू नहीं हुआ है, हम प्रभु भक्ति की पहली कक्षा में ही अटके पड़े हैं । 

प्रो.अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली 
९/०९/२६

Sunday, September 6, 2026

प्रवचन सभी के लिए नहीं - प्राकृत गाथा

प्रवचन सभी के लिए नहीं 

धम्मबोहो सव्वेसु , तच्चणाणं उसुय-विणयजुत्ते य।
पवयणं ण सव्वाणं , रयणं खलु वोढुं ण सक्कंति ॥

भावार्थ :

धर्म का सामान्य ज्ञान सभी को देना चाहिए
लेकिन तत्त्वज्ञान युक्त प्रवचन सिर्फ उसी को देना चाहिए जो विनम्रता से निवेदन करे ,उत्सुक हो ,जिज्ञासु हो
क्योंकि हीरे जैसे रत्नों  का मूल्य सभी वहन नहीं कर पाते हैं ।

अभिप्राय : 

तत्त्वज्ञान के लिए वे ही जीव पात्र होते हैं जिनमें रत्नत्रय की योग्यता हो । 


अनेकांत
५/९/२६
शिक्षक दिवस

Thursday, September 3, 2026

अपमान - प्राकृत गाथा

अपमान

परं ण अवमण्णेमि मे,
ण खलु अहंयारी एत्तिओ अम्हि।
अण्णस्स वि ण सहामि,
ण साहू गिहत्थिओ अम्हि॥

भावार्थ :
मैं दूसरों का अपमान करूँ, इतना अहंकारी भी नहीं हूँ;
किंतु दूसरे का अहंकार सहूँ, ऐसा भी नहीं है
क्योंकि मैं गृहस्थ हूँ, साधु नहीं।

अनेकांत
३/०९/२६

Tuesday, September 1, 2026

बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है

बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है 


*बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है*

नजरें कमजोर हुईं
तो चश्मा लगा लिया।
बाल सफेद हुए
तो उन्हें रंग लिया।
चेहरे पर झुर्रियाँ आईं
तो उन्हें श्रृंगार के पीछे छिपा लिया

कान कम सुनने लगे
तो श्रवण यंत्र लगा लिया।
दाँत झर गए
तो नकली दाँत लगा लिए

शक्ति क्षीण हुई
तो क्रोध के आवरण में
अपने अहंकार को और कठोर कर लिया
और
हम कहते हैं
हमने स्वयं को सँभाल लिया

पर कितना अद्भुत विरोधाभास है
हम शरीर को सँभालते सँभालते
उस संदेश को ही खो देते हैं
जो शरीर हमें प्रतिदिन दे रहा है

प्रकृति हमें समझा रही है
कि सब कुछ अनित्य है
देह बदल रही है
यौवन जा रहा है
इंद्रियाँ क्षीण हो रही हैं
समय हाथ से निकल रहा है

पर हम
हर संकेत पर पर्दा डालकर
स्वयं को समझाते रहते हैं
कि अभी कुछ नहीं बदला
हम दूसरों से नहीं
अपने ही मोह से धोखा खा रहे हैं

बुढ़ापा हमें डराने नहीं आया
वह जगाने आया है
हर झुर्री
अनित्य का उपदेश है

हर सफेद बाल
वैराग्य का निमंत्रण है
हर क्षीण होती इंद्रिय
देह से भेदज्ञान की पुकार है

हर घटती शक्ति
कहती है
अब बाहर नहीं
भीतर लौटो।

लेकिन हम
प्रकृति के इस शाश्वत प्रवचन को
श्रृंगार, सुविधा और अहंकार से ढँक देते हैं
कितना बड़ा अवसर खो देते हैं
देह को बचाते बचाते
आत्मानुभूति से बचने का

जबकि आवश्यकता यह नहीं कि
ढलती देह को रोकें,
आवश्यकता यह है कि
उसके प्रत्येक परिवर्तन में
अपने अपरिवर्तनशील शुद्धात्म तत्त्व
को पहचानें।

बुढ़ापा देह का सत्य है
और उसी सत्य को देखकर
निज चैतन्य का बोध होना
जीवन का सौभाग्य है।

 अनेकांत 
१/०९/२६