Tuesday, September 1, 2026

बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है

बुढ़ापा स्वयं एक प्रवचन है 


नजरें कमजोर हुईं
तो चश्मा लगा लिया।
बाल सफेद हुए
तो उन्हें रंग लिया।
चेहरे पर झुर्रियाँ आईं
तो उन्हें श्रृंगार के पीछे छिपा लिया

कान कम सुनने लगे
तो श्रवण यंत्र लगा लिया।
दाँत झर गए
तो नकली दाँत लगा लिए

शक्ति क्षीण हुई
तो क्रोध के आवरण में
अपने अहंकार को और कठोर कर लिया
और
हम कहते हैं
हमने स्वयं को सँभाल लिया

पर कितना अद्भुत विरोधाभास है
हम शरीर को सँभालते सँभालते
उस संदेश को ही खो देते हैं
जो शरीर हमें प्रतिदिन दे रहा है

प्रकृति हमें समझा रही है
कि सब कुछ अनित्य है
देह बदल रही है
यौवन जा रहा है
इंद्रियाँ क्षीण हो रही हैं
समय हाथ से निकल रहा है

पर हम
हर संकेत पर पर्दा डालकर
स्वयं को समझाते रहते हैं
कि अभी कुछ नहीं बदला
हम दूसरों को नहीं
अपने ही मोह को धोखा दे रहे हैं

बुढ़ापा हमें डराने नहीं आया
वह जगाने आया है
हर झुर्री
अनित्य का उपदेश है

हर सफेद बाल
वैराग्य का निमंत्रण है
हर क्षीण होती इंद्रिय
देह से भेदज्ञान की पुकार है

हर घटती शक्ति
कहती है
अब बाहर नहीं
भीतर लौटो।

लेकिन हम
प्रकृति के इस शाश्वत प्रवचन को
श्रृंगार, सुविधा और अहंकार से ढँक देते हैं
कितना बड़ा अवसर खो देते हैं
देह को बचाते बचाते
आत्मानुभूति से बचने का

जबकि आवश्यकता यह नहीं कि
ढलती देह को रोकें,
आवश्यकता यह है कि
उसके प्रत्येक परिवर्तन में
अपने अपरिवर्तनशील आत्मतत्त्व को पहचानें।

बुढ़ापा देह का सत्य है
और उसी सत्य को देखकर
आत्मतत्व का बोध होना
जीवन का सौभाग्य।

कुमार अनेकांत 
१/०९/२६