Saturday, June 21, 2025
Wednesday, February 12, 2025
प्राकृत वेलेंटाइन डे
प्राकृत वेलेंटाइन डे
हिययेण वरं विक्खं ,
लग्गदु पज्जावरणरक्खणस्स वि।
छाया होदि ण घावं
हविस्सदि सव्वकल्लाणं वि ।।
दिल लगाने से अच्छा है पेड़ लगाओ । वो छांव देता है घाव नहीं । (ऐसा करने से ) पर्यावरण का रक्षण भी होगा और सभी का कल्याण भी होगा ।
अनेकान्त
14/2/25
Friday, September 20, 2024
उत्तम क्षमा
उत्तम क्षमा
यदि किसी के लिए दिल में बैर है
तो मंदिर जाना सिर्फ एक सैर है
किसी भक्त का करते अपमान हैं
तो भगवान् की पूजा एक स्वांग है
श्रुत के विपरीत मन का ही गान है
तो प्रवचन नहीं सिर्फ व्याख्यान है
छूटा है धर्म यदि किसी का
तुम्हारे
कटु वचनों से 'अनेकांत'
अक्षम्य है अपराध ,दुरभिमान है ।
- कुमार अनेकांत
18/09/24 क्षमावाणी पर्व
Thursday, September 5, 2024
शिक्षक दिवस
लिखता मैं हूँ
मगर उसमें क्रांति का हुनर तुम्हारा है
बोलता मैं हूँ
मगर बातों में असर तुम्हारा है
पढ़ाता मैं हूँ
मगर उसमें ज्ञान का समुंदर तुम्हारा है
मुझे बनाने में जो
खुद स्वाहा होते गए
ऐसे गुरुओं को
नमन हमारा है
-प्रो अनेकांत कुमार जैन
5/09/24
प्रथम गुरु पूज्य माता -पिता , समस्त जीवन के समस्त गुरुजनवृन्द को शिक्षक दिवस पर सादर समर्पित
Tuesday, July 16, 2024
न जाने किस साजिश में फँसते जा रहे हैं
न जाने किस साजिश में फँसते जा रहे हैं
भरी महफ़िल में भी अकेले होते जा रहे हैं
अरसा गुजर गया उन्हें मनाने की कोशिश में
जितना करीब थे उतने ही दूर होते जा रहे हैं
तुम बेख़बर रहे हो हमारे हाल चाल से
और हम तेरी फ़िक्र में जले जा रहे हैं
ख्वाहिश कब मुक्कमल होती हैं यहाँ,
फिर भी ख्वाहिशों में मरे जा रहे हैं
कुमार अनेकांत
17/7/24
Tuesday, June 11, 2024
मम दुक्खं हु परिक्खा
मम दुक्खं हु परिक्खा
अण्णस्स अत्थि दुस्कम्मस्स फलं ।
जीवणे पक्खवादो
दुल्लहो खलु अप्पदंसणं ।।
भावार्थ -
जो मुमुक्षु अपने खुद के दुःख को परीक्षा और
दूसरों के दुःख को कर्मों की सजा मानते हैं,उनके जीवन में इतना पक्षपात है कि आत्मदर्शन दुर्लभ है ।
कुमार अनेकांत
Thursday, May 9, 2024
माँ की गाथा
अनेकांत कुमार जैन जी की एक प्राकृत कविता के संस्कृत अनुवाद का प्रयास मातृदिवस पर
नैव कल्याणमेवास्ति, जीवश्वासश्च यां विना |
या च लोकत्रयाचार्या, तस्यै मात्रे नमो नमः ||
कौशल तिवारी 10/05/20
*णमो माआअ*
.............
*जेण विणा जीवणस्स ,सासो वि कल्लाणो वि खलु ण हवइ।*
*तस्स भुवणेक्कं गुरु,पढमो णमो णमो माआअ ।।*
भावार्थ -
जिसके बिना जीवन का श्वास भी नहीं चलता और निश्चित रूप से जीवन का कल्याण भी नहीं होता ,उस तीनों लोकों में पहली शिक्षिका , मां ( माता) को नमन है नमन है ।
Anekant Kumar Jain
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