कुमार अनेकान्त की कवितायें
Sunday, August 23, 2026
दूरी - प्राकृत गाथा
दूरी
दूरट्ठिओ ण दूरो, जो जस्स मणम्मि णिच्चं संठिओ।
जो जस्स हिअए णत्थि, समीवट्ठिओ वि अइ दूरओ।।
जो जिसके मन में सदा बसा है, वह दूर रहकर भी पास है।
और जो जिसके हृदय में नहीं बसा, वह समीप रहकर भी अत्यन्त दूर है।
अनेकांत
२३/०८/२६
No comments:
Post a Comment
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment