अपमान
परं ण अवमण्णेमि मे,
ण खलु अहंयारी एत्तिओ अम्हि।
अण्णस्स वि ण सहामि,
ण साहू गिहत्थिओ अम्हि॥
भावार्थ :
मैं दूसरों का अपमान करूँ, इतना अहंकारी भी नहीं हूँ;
किंतु दूसरे का अहंकार सहूँ, ऐसा भी नहीं है
क्योंकि मैं गृहस्थ हूँ, साधु नहीं।
अनेकांत
३/०९/२६
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