Friday, September 20, 2024

उत्तम क्षमा

उत्तम क्षमा 

यदि किसी के लिए दिल में बैर है 
तो मंदिर जाना सिर्फ एक सैर है 
किसी भक्त का करते अपमान हैं 
तो भगवान् की पूजा एक स्वांग है 
श्रुत के विपरीत मन का ही गान है 
तो प्रवचन नहीं सिर्फ व्याख्यान है 
छूटा है धर्म यदि किसी का 
तुम्हारे
कटु वचनों से 'अनेकांत'
अक्षम्य है अपराध ,दुरभिमान है ।

- कुमार अनेकांत 
18/09/24 क्षमावाणी पर्व 

Thursday, September 5, 2024

शिक्षक दिवस

लिखता मैं हूँ 
मगर उसमें क्रांति का हुनर तुम्हारा है 
बोलता मैं हूँ 
मगर बातों में असर तुम्हारा है 
पढ़ाता मैं हूँ 
मगर उसमें ज्ञान का समुंदर तुम्हारा है 
मुझे बनाने में जो 
खुद स्वाहा होते गए
ऐसे गुरुओं को 
नमन हमारा है 

-प्रो अनेकांत कुमार जैन
5/09/24

प्रथम गुरु पूज्य माता -पिता , समस्त जीवन के समस्त गुरुजनवृन्द को शिक्षक दिवस पर सादर समर्पित

Tuesday, July 16, 2024

न जाने किस साजिश में फँसते जा रहे हैं

न जाने किस साजिश में फँसते जा रहे हैं
भरी महफ़िल में भी अकेले होते जा रहे हैं

अरसा गुजर गया उन्हें मनाने की कोशिश में 
जितना करीब थे उतने ही दूर होते जा रहे हैं

तुम बेख़बर रहे हो हमारे हाल चाल से 
और हम तेरी फ़िक्र में  जले जा रहे हैं

ख्वाहिश कब मुक्कमल होती हैं यहाँ,
फिर भी ख्वाहिशों में मरे जा रहे हैं

कुमार अनेकांत 
17/7/24

Tuesday, June 11, 2024

मम दुक्खं हु परिक्खा

मम दुक्खं हु परिक्खा
अण्णस्स अत्थि दुस्कम्मस्स फलं ।
जीवणे पक्खवादो
दुल्लहो खलु अप्पदंसणं ।।


भावार्थ -
जो मुमुक्षु अपने खुद के दुःख को परीक्षा और
दूसरों के दुःख को कर्मों की  सजा मानते हैं,उनके जीवन में इतना पक्षपात है कि आत्मदर्शन दुर्लभ है ।

कुमार अनेकांत

Thursday, May 9, 2024

माँ की गाथा

अनेकांत कुमार जैन जी की एक प्राकृत कविता के संस्कृत अनुवाद का प्रयास मातृदिवस पर 

नैव कल्याणमेवास्ति, जीवश्वासश्च यां विना |
या च लोकत्रयाचार्या, तस्यै मात्रे नमो नमः ||

कौशल तिवारी 10/05/20


*णमो माआअ*
.............

*जेण विणा जीवणस्स ,सासो वि कल्लाणो वि खलु ण हवइ।*

*तस्स भुवणेक्कं गुरु,पढमो णमो णमो माआअ ।।*

भावार्थ - 

जिसके बिना जीवन का श्वास भी नहीं चलता और निश्चित रूप से जीवन का कल्याण भी नहीं होता ,उस तीनों लोकों में पहली शिक्षिका , मां ( माता) को नमन है  नमन है ।
Anekant Kumar Jain

Friday, April 19, 2024

युवाओं मत मानो महावीर

*युवाओं तुम मत मानो महावीर*

मत मानो महावीर को 
पर उन्हें  जान तो लो 
आश्चर्य है
आज पाखंडों को देख
तुम्हें धर्मों से नफ़रत हो गई है 
पर स्वार्थी दुनिया के अनंत पाखंड देखकर भी तुम उसमें तो लगे हुए हो ,क्यों ? 
क्यों कि तुम्हें उसी दुनिया से अपना काम बनाना है ।
ठीक यही काम धर्म के साथ करो ,
कुछ धर्मात्माओं के पाखंड देखकर ,धर्म से नफरत मत करो ।
इसलिये कहता हूं ,भले ही अभी
धर्म को मत मानो ,पर जान तो लो ,
आत्म धर्म को समझना तुम्हारा मौलिक अधिकार है ।
आज जान लोगे तो कल पाल भी लोगे ।
पालन के भय से उसे यदि आज जान भी न पाए तो जब एक दिन दुनिया का यथार्थ समझ में आ जायेगा और
अंत हीन भटकन से उकता 
जाओगे ,
तब ,कहाँ जाओगे ?
महावीर को जानोगे 
उनसे कला सीखे रहोगे
तो ऐसे आड़े वक्त पर वे और उनका तत्वज्ञान काम आएंगे।
तुम्हें तुम्हारा भान करवाएंगे ।
अपने आत्मा को जानने और अनुभव करने की कला तुम्हें तब काम आएगी ,
आज समझ लोगे तो कल
नैया पार लग जायेगी ।

--
प्रो अनेकांत कुमार जैन ,नई दिल्ली
20/4/24

Sunday, March 10, 2024

आपने में अपनापन - प्राकृत गाथा

संसारसुलहो होदि 
परेसु खलु परत्ताणुसंधाणं ।
अप्पणेसु अपणत्तं 
अणुसंहाणदुल्लहो होदि ।।


इस संसार में पराये लोगों में पराये पन को खोजना भले ही आसान हो लेकिन अपनों में अपनापन खोजना वास्तव में दुर्लभ है  । 

दूसरा अर्थ 

पर में पराये पन का बोध फिर भी आसान है लेकिन अपनी आत्मा में अपनापन दुर्लभ है - इस संसार में कितना आश्चर्य है ? 

कुमार अनेकांत
11/3/2024