Monday, February 5, 2024

समय का सदुपयोग (उग्गाहा)

समय का सदुपयोग 
(उग्गाहा)

ण भविस्सइ समागमो,
सया भविस्सइ ण अहं भविस्सामि।
जदि दुवे य भविस्सन्ति,
ण भावं सिग्घधम्मं करिदव्वं ।।



यह सत्समागम हमेशा नहीं रहेगा ,यदि रहा तो हम न रहेंगे ,यदि ये दोनों  रहे तो जरूरी नहीं कि वैसे शुद्ध भाव रहें ,जैसे आज हैं । अतः यथा शीघ्र धर्म (आत्मानुभव)कर लेना चाहिए ।

कुमार अनेकांत 
5/02/23

Sunday, February 4, 2024

महत्वपूर्ण शेर शायरी (स्वरचित और संकलित)


क्या अजब जज़्बा है इश्क़ करने का 
उम्र जीने की है और शौक़ मरने का ॥

यक़ीनन ढूँढने होंगे हज़ारों बाग़बाँ हमको 
मगर उन पर भी नज़रें हों जो शाखें तोड़ देते हैं

की वो वक्त गुजर गया
जब तेरी हसरत थी हमें
अब तू खुदा भी बन जा
तो भी हम सजदा नहीं करेंगे...


तेरे सजदे के वास्ते नहीं चाहता खुदा होना 
खुद को जान लूँ तो खुदा हो जाऊं मैं

सैरगाह मत कहो खुदा के दर को शहंशाह ।
वहाँ हम इबादत को जाते हैं सैर को नहीं ।।
©कुमार अनेकान्त
24/11/22

लोग चाहते होंगे तुम्हें खूबियों से मगर ।
हम तो फिदा  ही तेरे गुनाहों पर हैं ।।
- कुमार अनेकान्त 
16/04/2016


मौत तो बहाना था उसूल उसे निभाना था।
वरना पल पल मरे हैं तेरे बिन जीते जीते ।।        ©-कुमार अनेकान्त                        

खुद अटकने से अटका , कोई और नही अटकाता ।                       
खुद को भूला, भटका , कोई और नहीं भटकाता।।-
   -   कुमार अनेकान्त (०५/०२/२०१६)

उधर दस वर्फ की चादर में सो गये,
ताकि हम रजाईयों में  सोते रहें ।
इधर दस ने तोड़ दीं सुहागा चूड़ियां ताकि
करोड़ों कलाईयों के कंगन यूं ही बजते रहें।।
-कुमार अनेकान्त

कायनात भी चाहे उसके खिलाफ हो,
पर वोट उसे ही दें जिसकी नीयत साफ़ हो |
©कुमार अनेकांत 2014

"गर तू जिंदा है तो ज़िन्दगी का सबूत दिया कर !
वरना, ये ख़ामोशी तो कब्रिस्तान में भी बिखरी देखी है
हमने !!"

अभी साजों के तराने बहुत हैं 
अभी जिंदगी के बहाने बहुत हैं 
ये दुनिया हकीकत की कायल नहीं है 
फसाने सुनाओ फसाने बहुत हैं ।

वो कतरा होकर भी, आपे से बाहर.. है!!
हम दरिया होकर भी, अपनी हद में रहते हैं..!!


मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है 
जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है 

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है 
जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है 

नई उम्रों की ख़ुद-मुख़्तारियों को कौन समझाए 
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है 

थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें 
सलीक़ा-मंद शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है 

बहुत बेबाक आँखों में तअ'ल्लुक़ टिक नहीं पाता 
मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है 

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का 
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है 

मेरे होंटों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो 
कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है 
               वसीम बरेलवी

समय ने जब जब अंधेरों से  दोस्ती की है
हमने अपना घर फूंक कर रोशनी की है


तुम्हें जीने में आसानी बहुत है।
तुम्हारे ख़ून में पानी बहुत है।।


लश्कर भी तुम्हारा है, सरदार तुम्हारा है
तुम झुठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है 
इस दौर के फरियादी जायें तो कहा जायें 
कानून तुम्हारा है, दरबार तुम्हारा है
सूरज की तपन तुमसे बर्दास्त नही होती 
एक मोम के पुतले सा किरदार तुम्हारा है
वैसे तो हर एक शह में जलवे हैं तुम्हारे ही
दुश्वार बहुत लेकिन दीदार तुम्हारा है


एक वक्त था जब यकीं तेरे  जादू पर भी था
अब तो तेरी हकीकत भी शक के घेरे में है
…......


सच आज भी है खामोश कि खता न हो जाये।       झूठ चिल्ला रहा है कि सच बयां न हो जाये।।                     -कुमार अनेकान्त 3//4/2016


दो चार बार हम जो जरा हँस हँसा लिए 
सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिए 
रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर 
अच्छा हुआ मेरे आपने सपने चुरा लिए

अपने मेयार से नीचे तो मैं आने से रहा,
शेर भूखा हो मगर घास तो खाने से रहा।
कर सको तो मेरी चाहत का यकीन कर लेना,
अब तुम्हें चीर के मैं दिल तो दिखाने से रहा।।

(~महशर आफरी


बशीर बद्र के टॉप 20 शेर

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो 
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए 

  कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी 
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता 
 
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं 
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है 

 दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों 

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला 
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला 

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं 
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे 

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी 
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी 

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से 
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो 

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा 
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में 
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में 

कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँही आँखें 
उदास होने का कोई सबब नहीं होता 

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे 
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला 
 
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है 
रहे सामने और दिखाई न दे 

इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं 
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं 

अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है 
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे 

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा 
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा 

जी बहुत चाहता है सच बोलें 
क्या करें हौसला नहीं होता 

आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है 
बेवफ़ाई कभी कभी करना 

उस की आँखों को ग़ौर से देखो 
मंदिरों में चराग़ जलते हैं 

मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए 
कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं

ये हैं मशहूर शायर वसीम बरेलवी के 20 बड़े शेर

1.अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

2.मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

3.झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया

4.उस ने मेरी राह न देखी और वो रिश्ता तोड़ लिया
जिस रिश्ते की ख़ातिर मुझ से दुनिया ने मुँह मोड़ लिया

5.उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले

6.क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया
उम्र-भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया

7.दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी
भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी

8.एक मंज़र पे ठहरने नहीं देती फ़ितरत
उम्र भर आँख की क़िस्मत में सफ़र लगता है

9.चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन
झूट से हारते देखा नहीं सच्चाई को

10.तुम साथ नहीं हो तो कुछ अच्छा नहीं लगता
इस शहर में क्या है जो अधूरा नहीं लगता

11.मोहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौट कर नहीं आते

12.जो मुझ में तुझ में चला आ रहा है सदियों से
कहीं हयात उसी फ़ासले का नाम न हो

13.दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

14.निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते
यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते

15.जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

16.वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता

17.हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें

18.हम अपने आप को इक मसअला बना न सके
इसलिए तो किसी की नज़र में आ न सके

19.आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है

20.ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी

हर सजा कबूल है मुझे ,                        
मगर शर्त इतनी सी है ।                      
गुनाहों की जो करे सुनवाई,                  
बेगुनाह होना चाहिए।।

उन्हें कामयाबी में सुकून नज़र आया 
तो वो दौड़ते गए
हमें सुकून में कामयाबी नज़र आई 
तो हम ठहर गए
ख्वाहिशों के बोझ में बशर
तू क्या कर रहा है
इतना तो जीना नहीं 
जितना तू मर रहा है

हार जाती है हर साजिश 
मुझे नाराज करने की 
मुझे खुश करने की 
कोशिश नहीं करनी पड़ती 
-कुमार अनेकान्त

Always be happy
मुश्किल कोई आन पड़ी तो घबराने से क्या होगा
जीने की तरकीब निकालो मर जाने से क्या होगा
बड़े सलीके से अपने लबों को खोलना है।
जहां पे कोई ना बोले वहीं पे बोलना है।।
उड़ान देगा यक़ीनन वो आसमां वाला।
हमारा काम तो अपने परों को खोलना है।।
किस्मत ने लिखे हैं कैसे कैसे रूप  ,
तदबीरें भी जिसकी गुलाम हो गईं ।
जाने कैसे रोका है उसने सैलाब को, 
आंखें भी आसुओं का बांध हो गईं ।।

कुमार अनेकान्त ©

तू छोड़ दे कोशिशें.....
इन्सानों को पहचानने की...!
यहाँ जरुरतों के हिसाब से .... 
सब बदलते नकाब हैं...!
अपने गुनाहों पर सौ पर्दे डालकर.
हर शख़्स कहता है-
" ज़माना बड़ा ख़राब है।"

लहजे में अपने हमेशा नरमी रखना ।
अमीर हो अमर नहीं ख्याल रखना ।।

अनेकान्त (29/10/25)

तुम रूठे हो कि ख्वाहिशें 
पूरी न हो  सकीं ।
उनका क्या जो जरूरतों को भी मुहताज़ रह गए ?

कुमार अनेकांत 
६/११/२०१९

जो हश्र हज़ारों का हुआ है,
थोड़ा हमारा भी सही ।
लाखों इल्ज़ाम हैं हम पर ,
थोड़ा तुम पर भी सही ।।
जब इन्टरनेट नहीं था प्रिये-कुमार अनेकान्त 

जब इन्टरनेट नहीं था प्रिये
लोग कैसे जीवन जीते थे  ?
बिना फोन फेसबुक के 
अपनी अभिव्यक्ति करते थे?

बच्चे कैसे करते थे होमवर्क ?
कैसे प्रोजेक्ट, असाइन्मेंट होता था ?
बिना पावर प्वाइन्ट के प्रिये
कैसे टीचर लेक्चर देता था ?

बिन शादी.com के  प्रिये ?
रिश्ता कैसे होता था ?
बिना फ्रेन्ड रिक्वेस्ट को भेजे 
क्यों कोई अन्जान से मिलता था ?

आज भी ऐसे हैं लोग प्रिये
जो बिन बोले भी बतिया लेते हैं।
मुस्कुराते लबों के पीछे भी
छुपे दर्द को भांप लेते हैं ।।

जिन्दगी वर्चुअल खत्म Actual
हम तो उस युग में जीते हैं ।
लाइट नहीं तो लाइफ नहीं,
इस भ्रम ट्री को सीचते हैं।।

उन्हें
मुझपर 
मुझसे 
ज्यादा 
भरोसा है 
हर समय
मैंने व्यर्थ ही 
खुद को 
कोसा है

@कुमार अनेकान्त

एक वोट माँगा था,दिल के चुनाव में
जमानत जब्त करवा दी ,उसने ख्वाब में
निर्दलीय था तो क्या हुआ,दिल तो था
नामांकन भी नहीं किया मेरे प्रस्ताव में

©Kumar Anekant (8/2/2017)


ये क्यूं कहें कि दिन आजकल हमारे खराब है 
कांटों में घिर गए हैं समझ लो गुलाब हैं.... (संकलित)

जीना मुश्किल है उनका इस दौर में
जो इबादत में हैं, जमाने में नहीं
या खुदा ये मशीनें, ये सैकड़ों पासवर्ड
दीवाने कहाँ जाएँ, जिन्हें खुद की खबर नहीं
- कुमार अनेकान्त (18/02/26)
 मस्ती जिंदा है तो हस्ती जिंदा है वरना सारी दुनिया जबरदस्ती जिंदा है


वे रंज करते रहे कि देर से क्यों आए, 
हमने गनीमत मानी कि पहुँच तो गए। 

- कुमार अनेकांत 
 १०/०५/२०२६ 

 

Saturday, February 3, 2024

निंदा....( प्राकृत गाथा )

निंदा....

करदु करदु मम णिंदा , गइदूण पइगेहे य जहासक्कं ।
पसिद्धो होदि तुम्हे
वि निंदगसम्माटरूवेण ।। 


करो करो खूब करो,बल्कि घर घर जाकर मेरी निंदा जितनी कर सको उतनी करो ,(क्यों कि) इससे तुम भी निंदक सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हो जाओगे ।

©कुमार अनेकांत 
2/2/24

Saturday, January 27, 2024

तित्थसंरक्खणं / तीर्थ संरक्षण

वड्ढदु णूयणतित्थं
सया मम कामणा पुरातित्थं वि ।
बालगस्स लालणे वि
मूलरक्खणं मा विस्सरिदव्वं ।।
मेरी कामना है कि सदा नए तीर्थों का निर्माण हो किन्तु प्राचीन तीर्थ भी संरक्षित हों ,उनका विकास हो । नवजात बालक के लालन पालन में मूल माता पिता और दादा दादी का रक्षण नहीं भूलना चाहिए ।

©कुमार अनेकांत 
28/1/24

Sunday, January 21, 2024

मैं राम होना चाहता हूँ

मैं श्रीराम होना चाहता हूँ 
- कुमार अनेकांत जैन 

मैं राम होना चाहता हूँ ,श्री राम होना चाहता हूँ ,
तोड़कर अब सारे बंधन भगवान् होना चाहता हूँ ।

ऋषभ के आदर्श को स्वीकार करना चाहता हूँ 
भरत सा निर्लिप्त जीवन आज जीना चाहता हूँ ।

मैं राम होना ....

अजित होकर आत्मा में  विश्राम लेना चाहता हूँ, 
सुमतिवत् शुद्धात्मा का राम होना चाहता हूँ ।  

मैं राम होना....
                             तोड़कर अब सारे बंधन अनंत होना चाहता हूँ,
भोग के इस सरोवर में पद्म होना चाहता हूँ ।

मैं राम होना....

ऋषि मुनि की इस धरा पर मुक्त जीना चाहता हूँ,दया अहिंसा से जगत को अवध करना चाहता हूँ ।

मैं राम होना....

नगरी विनीता की धरा से निरहंकार होना चाहता हूँ,                          शिथिल हों अब सारे बंधन अभिनंदन होना चाहता हूँ ।

मैं राम होना.....

सुव्रत मुनि के आचरण का अंजाम होना चाहता हूँ,संसार सागर पार अभिराम होना चाहता हूँ ।

मैं राम होना....

अनंत जन्म के कर्मधनुष का शीध्र भंजन चाहता हूँ ।
मुक्ति सीता का वरणकर निष्काम होना चाहता हूँ ।

मैं राम होना...

देख नश्वर जगत को जो 
स्वयं वैरागी हुए,
उस विरागी दशरथ की संतान होना चाहता हूँ। 

मैं श्री राम होना चाहता हूं ,तोड़कर अब सारे बंधन निष्काम होना चाहता हूँ ।

सम्यक्त्व अयोध्या की धरा पर ज्ञानमंदिर चाहता हूँ,
और उसके भाल पर शिखर होना चाहता हूँ। 

राम होना...
तोड़कर मैं सारे बंधन श्री राम होना चाहता हूं ।

प्राप्तकर शुद्धात्मा खुद में बरसना चाहता हूँ, 
मांगीतुंगी के शिखर से सिद्ध होना चाहता हूँ।। 
               
राम होना --2
तोड़कर अब सारे बंधन भगवान् होना चाहता हूँ,मैं श्री राम होना चाहता हूँ- 2

21/01/24

Monday, January 8, 2024

अयोध्या (प्राकृत गाथा )

धण्णो णव अयोज्झा 
उसह-भरह-बाहुबली-अजिय-सुमइ ।
पवित्तो खलु जम्मभूमि 
अहिणंदण-अणंत-रामो य ।।

यह नई अयोध्या धन्य है जो प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव,उनके पुत्र भरत (जिनके नाम पर देश का नाम भारत हुआ )तथा बाहुबली ,द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ,चतुर्थ तीर्थंकर अभिनन्दननाथ,पंचम तीर्थंकर सुमतिनाथ ,चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ तथा भगवान् श्री राम की पवित्र जन्मभूमि है ।

कुमार अनेकांत 
9/1/24

Monday, December 18, 2023

भारत नामकरण

उसहसुपुत्तो भरदो 
चक्कवत्तीसासगो छक्खंडे
देसोभारदवस्सो
णामो वि जादो भरदत्तो 

तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र भरत जो छह खंड के चक्रवर्ती सुशासक राजा थे , अपने देश का नाम भारतवर्ष उन्हीं भरत सम्राट के कारण पड़ा । 

इइ सुकहापुराणेसु ,
गायन्ति खलु वेदजइणागमेसु ।
खरवेलसिलालेहे ,
'भरधवस' खलु दसमपंतिम्मि ।। 

यह सुकथा वैदिक एवं जैन पुराणों एवं आगमों में खुलकर गाई गयी है तथा खारवेल के शिलालेख में भी भारत वर्ष यही नाम मिलता है । 

19/12/23
प्रो अनेकांत जैन