Tuesday, September 8, 2026

बिना संगीत का भजन: प्राकृत गाथा

*बिना संगीत का भजन*


*तूरविहीणे वि मणे, जइ ण रमइ मणं अवि भत्तिजुत्तेण ।*
*अंतस्सरो ण जाओ, पढमं भत्तिकक्खं अज्ज वि ॥*

भावार्थ :
वाद्य-यंत्रों से रहित होने पर यदि मन (प्रभु की) भक्तियुक्त होकर नहीं रमता है , तो समझना  कि अभी अन्तः स्वर (अंदर का संगीत) जागृत नहीं हुआ है; (हम) आज भी भक्ति की पहली कक्षा में ही हैं।

अभिप्राय : 

यदि अभी भी बिना वाद्य यंत्रों के हमारा मन भक्ति में नहीं लगता है तो उसका मतलब है कि अभी अंदर का संगीत शुरू नहीं हुआ है, हम प्रभु भक्ति की पहली कक्षा में ही अटके पड़े हैं । 

प्रो.अनेकांत कुमार जैन,नई दिल्ली 
९/०९/२६

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