Monday, May 11, 2020

समकालीन प्राकृत कविता 1, मां

अनेकांत कुमार जैन जी की एक प्राकृत कविता के संस्कृत अनुवाद का प्रयास मातृदिवस पर 

नैव कल्याणमेवास्ति, जीवश्वासश्च यां विना |
या च लोकत्रयाचार्या, तस्यै मात्रे नमो नमः ||
*णमो माआअ*
.............

*जेण विणा जीवणस्स ,सासो वि कल्लाणो वि खलु ण हवइ।*

*तस्स भुवणेक्कं गुरु,पढमो णमो णमो माआअ ।।*

भावार्थ - 

जिसके बिना जीवन का श्वास भी नहीं चलता और निश्चित रूप से जीवन का कल्याण भी नहीं होता ,उस तीनों लोकों में पहली शिक्षिका , मां ( माता) को नमन है  नमन है ।

कौशल तिवारी

समकालीन प्राकृत कविता २, करोना

प्राकृत कविता २

करोणाए पिहितं खलु ,विस्समहामारी भारहदेसे |
गेहे गेहे वि हवइ, जुद्धं कारणं चलदूरभासं ||


भावार्थ -

निश्चित ही विश्व महामारी करोना के कारण भारतदेश में बंदी है ,लेकिन घर परिवार में भी जो लड़ाईयां चल रहीं हैं उसका कारण मोबाइल फ़ोन है |

कुमार अनेकांत@
११/०५/२०२०

Monday, May 4, 2020

गृह योद्धा को सलाम

*गृह योद्धा को सलाम*

मैं नहीं बरसा 
सकता हैली कॉप्टर
से तुम्हारे ऊपर 
फूल 
न ही जलवा सकता
हूं हर देहरी पर 
दिये
और न ही बजवा 
सकता हूं 
छतों और बालकनियों से 
तुम्हारे सम्मान 
में थालियां और 
तालियां 

लेकिन 
करोना युद्ध में
हम सभी को
लॉक डाउन में
घर पर ही
अच्छे से रखकर
शुद्ध खाना खिलाकर
घर की साफ सफाई
रखकर
करोना से जो
लड़ाई तुमने 
लड़ी है 
उसके लिए 
कम हैं ये सभी 
सम्मान
हम तो हाज़िर
कर सकते हैं 
सिर्फ अपनी
जान 
*गृहिणी*

कुमार अनेकांत©️
४/५/२०२०

Sunday, May 3, 2020

अथाई

*अथाई*

काव्य का है बीज पर हुई नहीं सिंचाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

नवोदित और उदित
का संगम,
सार्वभौमिक सुरों का सरगम ।
कैद रचनाएं चाहतीं थीं वर्षों से रिहाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

आज नहीं तो कल मानेगा, 
विश्व हिंदी का दास बनेगा ।
देखेगा भारत की
साहित्यिक तरुनाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

कबीर प्रसाद निराला बसते,
मीरा महादेवी 
सुभद्रा रमते ।
छुपे हैं अब तो हर दिल में परसाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

दौलत भूधर बनारसी दास गढ़ेंगे,
सूर,तुलसी,रहीम
अब बन कर रहेंगे ।
रचेंगे अब तो महाकाव्य,
और बिहारी सा सत्साई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

कुमार अनेकांत©️ 
३/५/२०२०

Thursday, April 30, 2020

शाश्वत परिणय

*शाश्वत परिणय*

अदृश्य हैं संबंध हमारे,
अनभिव्यक्त बंधन है सारे ।
जुड़ गया हूं कुछ इस तरह से, 
न तुम हमारे हम तुम्हारे ।।१।।

एक है सब दो नहीं है,
अभेद है सब भेद नहीं है ।
तुम नहीं कुछ मैं नहीं कुछ, 
है सब कुछ पर कुछ नहीं है ।।२।।

कुछ नहीं कहना है मुझको ,
कह दिया सब मौन ने ही।
 उत्तर की आशा नहीं है ,
बातें आंखों ने कहीं हैं ।।३।।

सुनसान है संसार हमारा ,
पर संवाद हर पल चल रहा है ।
प्रकट भले ना हो परंतु ,
प्यार दोनों में पल रहा है ।।४।।

व्यक्त भले ना हो परंतु ,
परिणय शाश्वत हो चुका है ।
अनेकांत में था जो द्वंद्व ,
वह अनुभूति में खो चुका है ।।५।।

कुमार अनेकांत 
१/१/२००१

Sunday, April 26, 2020

कांजी स्वामी मरने नहीं चाहिए

कांजी स्वामी मरने नहीं चाहिए 
            -    कुमार अनेकांत
वैसे ही जैसे गांधी नहीं मरे , 
प्रशंसा ,आलोचना युक्त अपने 
विचारों के साथ
मनुष्यों में जिंदा हैं वे 
वे जिंदा हैं तभी राजनीति में
अहिंसा की चर्चा जिंदा है , 
उसी प्रकार कांजी स्वामी 
यदि जिंदा रहेंगे 
तो महावीर का मूल 
तत्वज्ञान और जिनागम
का स्वाध्याय जिंदा रहेगा 
अन्यथा 
युग के प्रवाह में
उनके अनुयायियों 
में भी पनपते कोरे
क्रिया कांड 
बहा ले जाएंगे 
अध्यात्म 
और 
नहीं बचेगा 
चर्चा में भी
शुद्ध आत्म ।

Wednesday, April 22, 2020

जीना सिखा दिया

*जीना सिखा दिया* 
        
कुमार अनेकांत ,नई दिल्ली
                                  २२/०४/२०२०

मृत्यु भय देकर भी जीना सिखा दिया 
वायरस तूने हमको जीना सिखा दिया 

चुम्बन संक्रमण है प्यार नहीं ,
आलिंगन प्रदूषण है दुलार नहीं ।
हाथ मिलाना दोषपूर्ण वह,
अब सच्चा अभिवादन नहीं ।।

हाथ जोड़कर अभिवादन,
दुनिया को सिखा दिया ।
मृत्यु भय देकर भी ,
जीना सिखा दिया ।।

क्या खाना और कैसे खाना ,
कैसे चलना कैसे बोलना ।
घर पर रहना घर का खाना ,
शुद्ध आहार सिखा दिया ।।

मांसाहार छुड़वाकर,
शाकाहार सिखा दिया।
मृत्यु भय देकर भी ,
जीना सिखा दिया ।।

मंदिर बंद हैं भगवान् बंद हैं ,
कोरे सब क्रिया कांड बंद हैं ।
अपने ही भीतर परमात्म बैठा ,
ऐसा आतम राम दिखा दिया ।।

बिन मंदिर मूर्ति आराधना,
अध्यात्म सिखा दिया।
मृत्यु भय देकर भी ,
तूने जीना सीखा दिया ।।

कोई जन्में कोई मरे,
न कोई बुलाए न कोई जाए ।
हर बीमार को अकेले ही,
लड़ना सिखा दिया ।।

कोई किसी का सगा नहीं,
न कोई शरण बता दिया।
मृत्यु भय देकर भी ,
तूने जीना सीखा दिया ।।

कैसा मोह और कैसी माया,
कौन जीता और कौन हारा ।
क्रोध मान और लोभ को भी,
उसकी औकात दिखा दिया ।।

राजा हो चाहे रंक ,
जात पात सब एक कर दिया।
मृत्यु भय देकर भी तूने ,
जीना सिखा दिया ।।

मानव बस एक कठपुतली है,
कर्तृत्व नशा सब चूर कर दिया ।
कोरा विकास और विज्ञानवाद,
क्षणभर में सब धो के धर दिया।।

संप्रदाय और धर्म एक कर,
सबको धत्ता बता दिया ।
मृत्यु भय देकर भी तूने ,
जीना सिखा दिया ।।

सब वेद पुराण कुरआन अवेस्ता,
ग्रंथ बाइबिल आगम की शिक्षा ।
सिखा न सके करोड़ों शब्दों में ,
बिन शब्दों के वो सार बता दिया ।।

दुनिया जितना भी उछले सबको,
भारत के चरणों में ला दिया ।
मृत्यु भय देकर भी,
तूने जीना सिखा दिया ।।
drakjain2016@gmail.com