Thursday, May 14, 2020

समकालीन प्राकृत कविता- ४ , लॉक डाउन में ऑनलाइन तत्त्वज्ञान

*समकालीन प्राकृत कविता* - ४

 

*लॉक डाउन में ऑनलाइन तत्त्वज्ञान*

 

*जिणस्स य तच्चणाणं,*
*पसारयन्ति ऑणलइण सिविरेेण।*

*पण्डिया जिणधम्मस्स,*
*टोडरमलस्स णव वंसजा*।।

 

भावार्थ –

पण्डित टोडरमल जी के नव वंशज जिनधर्म-दर्शन के पण्डित ( युवा विद्वान) ऑनलाइन शिविर के माध्यम से जिनेन्द्रदेव का तत्त्वज्ञान प्रसारित कर रहे हैं |

@कुमार अनेकांत १४/०५/२०२० drakjain2016@gmail.com

Tuesday, May 12, 2020

समकालीन प्राकृत कविता -३ मजदूर और मजबूर

प्राकृत कविता -३ 

मजदूर और मजबूर 

मयऊरा जयदे खलु , वयं विवसो 
पहवाउजाणेहिं |
गच्छंति गेहगामा, सहस्समीला य पादेहिं || 

भावार्थ -

इस देश में मजदूर ही वास्तव में जयवंत हैं ,क्यों कि हम लोग पथ(रेल और बस) तथा वायुयान के द्वारा यात्रा के लिए (विवश) मजबूर हैं और वे हजारों मील अपने अपने गाँव और घर पैदल ही जा रहे हैं |

@कुमार अनेकांत १२/०५/२०२० 
drakjain2016@gmail.com

Monday, May 11, 2020

समाहिमरणभावणा




आयरिय-अणेयंतकुमारजइणेण विरइदं 


   
समाहिमरणभावणा

   (समाधि मरण भावना )

          (उग्गाहा छंद)


उवसग्गे दुरभिक्खे,असज्झरोगे च विमोयणकसाय ।
अब्भंतरबाहिरा च सल्लेहणपुव्वगं मरणसमाहि ।।1 ।।

असाध्य उपसर्ग  ,दुर्भिक्ष या रोग आदि आने पर अभ्यांतर और बाह्य कषाय के विमोचन के लिए सल्लेखना पूर्वक मरण समाधि कहलाती है ।। ।।

वित्तेण   वि खलु  मरिज्जदि,अवित्तेण  वि  खलु  अवस्स  मरिज्जदि  
जदि दोहिं   वि  मरिस्सदि ,वरं हि सुदाणेण खलु  मरिदव्वं ।।2।। 

धन के होने पर भी निश्चित मरता (मरिज्जदि) है, धन के न होने पर भी अवश्य मरता (मरिज्जदि) है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) सम्यक् दानपूर्वक ही मरण करना चाहिए।

परिग्गहेण  मरिज्जदि,अपरिग्गहेण वि अवस्स मरिज्जदि 
जदि दोहिं वि  मरिस्सदि,वरं हि अपरिग्गहेण मरिदव्वं ।।3।। 

परिग्रह के होने पर भी निश्चित मरता (मरिज्जदि) है, परिग्रह के न होने पर भी अवश्य मरता (मरिज्जदि) है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) अपरिग्रह धर्म पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

कसायेण वि मरिज्जदि,णिक्कसायेण वि अवस्स मरिज्जदि    
जदि दोहिं वि मरिस्सदि,वरं हि वीयराये मरिदव्वं ।।4।।
 
     कषाय के होने पर भी निश्चित मरता (मरिज्जदि) है, कषाय के न होने पर भी अवश्य मरता (मरिज्जदि) है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) वीतराग भाव पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

कोहेण वि मरिज्जदि,खंतिखम्मेण वि अवस्स मरिज्जदि 
         जदि दोहिं वि  मरिस्सदि,वरं हि खंतिखम्मेण मरिदव्वं ।।5।।

     क्रोध के होने पर भी निश्चित मरता है, क्रोध के न होने पर शांति और क्षमा में भी अवश्य मरता  है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) शांति और उत्तम क्षमा पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

माणेण वि   मरिज्जदि ,मज्जवे वि खलु अवस्स मरिज्जदि
जदि दोहिं वि  मरिस्सदि,वरं मज्जवधम्मेण मरिदव्वं ।।6।।

     मान के होने पर भी निश्चित मरता है, मार्दव होने पर भी अवश्य मरता  है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) उत्तम मार्दव धर्म पूर्वक ही मरण करना चाहिए।
मायाए वि मरिज्जदि,अज्जवेण वि खलु अवस्स मरिज्जदि
जदि दोहिं वि  मरिस्सदि,वरं    अज्जवधम्मे      मरिदव्वं   ।।7।।

     माया के होने पर भी निश्चित मरता है, आर्जव  होने पर भी अवश्य मरता  है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) उत्तम आर्जव  धर्म पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

लोहेण वि     मरिज्जदि,सोयेण वि य खलु अवस्स मरिज्जदि 
जदि दोहिं वि  मरिस्सदि,वरं हि सोयधम्मेण मरिदव्वं ।।8।।

     लोभ के होने पर भी निश्चित मरता है,  शुचिता(शौच धर्म ) के  होने पर भी अवश्य मरता  है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) उत्तम शौच धर्म पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

संजमेण वि मरिज्जदि असंजमेण वि  अवस्स मरिज्जदि 
जदि दोहिं वि  मरिस्सदि ,वरं   संजमधम्मे     मरिदव्वं ।।9।।

संयम के होने पर भी निश्चित मरता है,  असंयम के  होने पर भी अवश्य मरता  है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) उत्तम संयमधर्म पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

                       एयंतेण  मरिज्जदि ,अणेयंतेण वि अवस्स मरिज्जदि 
    जदि दोहिं वि  मरिस्सदि वरं हि अणेयंतेण मरिदव्वं ।।10।।

एकांत मानने पर भी निश्चित मरता है,  अनेकांत मानने पर भी अवश्य मरता  है। यदि दोनों परिस्थिति होने पर भी मरण होगा, तो उत्तम है (व्यक्ति को) अनेकांत धर्म पूर्वक ही मरण करना चाहिए।

                                                                     प्रो.अनेकांत कुमार जैन  

समकालीन प्राकृत कविता 1, मां

अनेकांत कुमार जैन जी की एक प्राकृत कविता के संस्कृत अनुवाद का प्रयास मातृदिवस पर 

नैव कल्याणमेवास्ति, जीवश्वासश्च यां विना |
या च लोकत्रयाचार्या, तस्यै मात्रे नमो नमः ||
*णमो माआअ*
.............

*जेण विणा जीवणस्स ,सासो वि कल्लाणो वि खलु ण हवइ।*

*तस्स भुवणेक्कं गुरु,पढमो णमो णमो माआअ ।।*

भावार्थ - 

जिसके बिना जीवन का श्वास भी नहीं चलता और निश्चित रूप से जीवन का कल्याण भी नहीं होता ,उस तीनों लोकों में पहली शिक्षिका , मां ( माता) को नमन है  नमन है ।

कौशल तिवारी

समकालीन प्राकृत कविता २, करोना

प्राकृत कविता २

करोणाए पिहितं खलु ,विस्समहामारी भारहदेसे |
गेहे गेहे वि हवइ, जुद्धं कारणं चलदूरभासं ||


भावार्थ -

निश्चित ही विश्व महामारी करोना के कारण भारतदेश में बंदी है ,लेकिन घर परिवार में भी जो लड़ाईयां चल रहीं हैं उसका कारण मोबाइल फ़ोन है |

कुमार अनेकांत@
११/०५/२०२०

Monday, May 4, 2020

गृह योद्धा को सलाम

*गृह योद्धा को सलाम*

मैं नहीं बरसा 
सकता हैली कॉप्टर
से तुम्हारे ऊपर 
फूल 
न ही जलवा सकता
हूं हर देहरी पर 
दिये
और न ही बजवा 
सकता हूं 
छतों और बालकनियों से 
तुम्हारे सम्मान 
में थालियां और 
तालियां 

लेकिन 
करोना युद्ध में
हम सभी को
लॉक डाउन में
घर पर ही
अच्छे से रखकर
शुद्ध खाना खिलाकर
घर की साफ सफाई
रखकर
करोना से जो
लड़ाई तुमने 
लड़ी है 
उसके लिए 
कम हैं ये सभी 
सम्मान
हम तो हाज़िर
कर सकते हैं 
सिर्फ अपनी
जान 
*गृहिणी*

कुमार अनेकांत©️
४/५/२०२०

Sunday, May 3, 2020

अथाई

*अथाई*

काव्य का है बीज पर हुई नहीं सिंचाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

नवोदित और उदित
का संगम,
सार्वभौमिक सुरों का सरगम ।
कैद रचनाएं चाहतीं थीं वर्षों से रिहाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

आज नहीं तो कल मानेगा, 
विश्व हिंदी का दास बनेगा ।
देखेगा भारत की
साहित्यिक तरुनाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

कबीर प्रसाद निराला बसते,
मीरा महादेवी 
सुभद्रा रमते ।
छुपे हैं अब तो हर दिल में परसाई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

दौलत भूधर बनारसी दास गढ़ेंगे,
सूर,तुलसी,रहीम
अब बन कर रहेंगे ।
रचेंगे अब तो महाकाव्य,
और बिहारी सा सत्साई,
नवांकुर सींचती अखिल पहल अथाई ।।

कुमार अनेकांत©️ 
३/५/२०२०