Monday, February 12, 2024

निजदोषों का दर्शन ( प्राकृत गाथा )

दस्सदि खलु णियदोसं ,
सज्झायेण णाभावदोसाणं ।
अभावो य होदि तस्स ,
तवचरित्ताप्पाणुभवेण ।।

स्वाध्याय से निजदोषों का दर्शन तो होता है किंतु उन दोषों का अभाव नहीं होता ,उन दोषों का अभाव तप चारित्र और आत्मानुभव से ही होता है । 

©कुमार अनेकांत
12/2/24

Sunday, February 11, 2024

विपत्ति काल ( प्राकृत गाथा )

पस्सइ कालगहवत्थु
परदोसं मणुसो विवत्तिकाले ।
ण  पस्सइ कम्मदोसा,
अम्मं कहं बबइबबूलेण ।।

बुरे दिन आने पर मनुष्य कालसर्प दोष,ग्रह दोष,वास्तु दोष , परिजनों के दोष आदि बाहर में ही दोष तो देखता है किन्तु स्वयं अपने कर्मों के दोष नहीं देखता । यह भी विचारना चाहिए कि बबूल के बोने पर आम भला कैसे हो सकता है ? 

कुमार अनेकांत 
12/2/24

Friday, February 9, 2024

ठंडक ( Prakrit poetry)

ठंडक


असुहचिंतगविपदे वि
कीरइ य सहाणुभूइपदंसणं ।
कट्ठेहं दंसणेण ,
हिययो तस्स होइ सीयलं ।।

मेरा अहित चिंतन करने वाला भी विपदा के समय मेरे पास आकर सहानुभूति प्रदर्शित करता है ,(ऐसा क्यों न हो ) मैं कष्ट में हूँ ,ऐसा देखकर उसके हृदय को ठंडक जो पड़ती है ।

©कुमार अनेकांत 
10/2/24

Thursday, February 8, 2024

ज्येष्ठ प्रेम ( प्राकृत काव्य )

ज्येष्ठ प्रेम 

जेट्ठोमि सया अहं 
तुम्हत्तो तुम्हे य वसइ हियये।
जइ च इच्छदि सम होदु
सगहियये खलु वसदु ममावि ।।

मैं तुमसे सदा ज्येष्ठ ( सिद्ध होता) हूँ ,क्यों कि तुम मेरे हृदय में रहते हो ।और यदि (तुम भी) मेरे समान(  ज्येष्ठ) होना चाहते हो तो मुझे भी अपने हृदय में जरूर बसा लो ।

©कुमार अनेकांत
10/2/24

Monday, February 5, 2024

व्यर्थ प्रयत्न ( प्राकृत गाथा )

अंधयारे य छाया ,
जरे काया मरणमाया कयावि ।
ण खलु ददइ सहजोगं,
पयत्तं जहासक्कं  ।।
अंधकार में छाया ,बुढ़ापे में  काया और मृत्यु के समय माया,निश्चित ही कभी भी सहयोग नहीं देती है ,यथा शक्ति कितना भी प्रयत्न कर लो ।

©कुमार अनेकांत 
6/2/24

समय का सदुपयोग (उग्गाहा)

समय का सदुपयोग 
(उग्गाहा)

ण भविस्सइ समागमो,
सया भविस्सइ ण अहं भविस्सामि।
जदि दुवे य भविस्सन्ति,
ण भावं सिग्घधम्मं करिदव्वं ।।



यह सत्समागम हमेशा नहीं रहेगा ,यदि रहा तो हम न रहेंगे ,यदि ये दोनों  रहे तो जरूरी नहीं कि वैसे शुद्ध भाव रहें ,जैसे आज हैं । अतः यथा शीघ्र धर्म (आत्मानुभव)कर लेना चाहिए ।

कुमार अनेकांत 
5/02/23