तीव्रकषाययुक्त और मूर्ख मनुष्य से कहकर क्षमा याचना नहीं करनी चाहिए ,इससे तो अच्छा है आत्मस्थ होकर (उन्हें क्षमा कर देना चाहिए और अंदर ही अंदर) भावों विशुद्धि प्राप्त करनी चाहिए ।
जिनकी दिव्य वाणी को सुनकर श्वेताम्बर भी (अपना मताग्रह त्यागकर) दिगंबर हो रहे हैं ,(उन ) तीनों लोकों में पूज्य महान दिगंबर जैन आचार्य कुन्दकुन्द को मेरा नमस्कार है ।